रहीम के अमर नीति दोहे

अब्दुर्रहीम ख़ानख़ाना
अन्य संत साहित्य संत साहित्य रहीम
॥ दोहा ॥

रहिमन धागा प्रेम का, मत तोरो चटकाय।
टूटे पे फिर ना जुरे, जुरे गाँठ परि जाय॥

जो रहीम उत्तम प्रकृति, का करि सकत कुसंग।
चन्दन विष व्यापत नहीं, लपटे रहत भुजंग॥

॥ चौपाई ॥

१. तरुवर फल नहिं खात है, सरवर पियहि न पान।
कहि रहीम पर काज हित, संपति संचहि सुजान॥
अर्थ: पेड़ अपने फल स्वयं नहीं खाते और नदियाँ अपना पानी खुद नहीं पीतीं। सज्जन लोग दूसरों की भलाई के लिए ही धन संचित करते हैं।

२. रहिमन देखि बड़ेन को, लघु न दीजिए डारि।
जहाँ काम आवे सुई, कहा करे तरवारि॥
अर्थ: बड़े लोगों को देखकर छोटों की उपेक्षा मत कीजिए, क्योंकि जहाँ सुई काम आती है वहाँ तलवार कुछ नहीं कर सकती।

३. रूठे सुजन मनाइए, जो रूठै सौ बार।
रहिमन फिरि फिरि पोइए, टूटे मुक्ताहार॥
अर्थ: यदि कोई भला और सज्जन व्यक्ति रूठ जाए तो उसे बार-बार मना लेना चाहिए, जैसे मोतियों की माला टूट जाने पर बार-बार पिरोई जाती है।

४. दोनों रहिमन एक से, जों लों बोलत नाहिं।
जान परत हैं काक पिक, रितु बसंत के माहिं॥
अर्थ: कौआ और कोयल देखने में एक जैसे लगते हैं जब तक कि वे बोलते नहीं। वसंत ऋतु आने पर उनकी बोली से भेद तुरंत प्रकट हो जाता है।

५. रहिमन पानी राखिए, बिन पानी सब सून।
पानी गए न ऊबरै, मोती, मानुष, चून॥
अर्थ: मनुष्य को अपने जीवन में मान-मर्यादा (पानी) अवश्य बचाकर रखनी चाहिए; क्योंकि बिना पानी के मोती की चमक, मनुष्य का सम्मान और आटे का कोई अस्तित्व नहीं रह जाता।

॥ दोहा ॥

जैसी परे सो सहि रहे, कहि रहीम यह देह।
धरती पर ही परत है, सीत घाम औ मेह॥

सरल हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक महत्व

कवि रहीम के दोहे व्यावहारिक जीवन, नीति, लोक-व्यवहार और प्रेम की मर्यादा सिखाने वाले अनमोल मोती हैं।

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।