रहिमन धागा प्रेम का, मत तोरो चटकाय।
टूटे पे फिर ना जुरे, जुरे गाँठ परि जाय॥
जो रहीम उत्तम प्रकृति, का करि सकत कुसंग।
चन्दन विष व्यापत नहीं, लपटे रहत भुजंग॥
१. तरुवर फल नहिं खात है, सरवर पियहि न पान।
कहि रहीम पर काज हित, संपति संचहि सुजान॥
अर्थ: पेड़ अपने फल स्वयं नहीं खाते और नदियाँ अपना पानी खुद नहीं पीतीं। सज्जन लोग दूसरों की भलाई के लिए ही धन संचित करते हैं।
२. रहिमन देखि बड़ेन को, लघु न दीजिए डारि।
जहाँ काम आवे सुई, कहा करे तरवारि॥
अर्थ: बड़े लोगों को देखकर छोटों की उपेक्षा मत कीजिए, क्योंकि जहाँ सुई काम आती है वहाँ तलवार कुछ नहीं कर सकती।
३. रूठे सुजन मनाइए, जो रूठै सौ बार।
रहिमन फिरि फिरि पोइए, टूटे मुक्ताहार॥
अर्थ: यदि कोई भला और सज्जन व्यक्ति रूठ जाए तो उसे बार-बार मना लेना चाहिए, जैसे मोतियों की माला टूट जाने पर बार-बार पिरोई जाती है।
४. दोनों रहिमन एक से, जों लों बोलत नाहिं।
जान परत हैं काक पिक, रितु बसंत के माहिं॥
अर्थ: कौआ और कोयल देखने में एक जैसे लगते हैं जब तक कि वे बोलते नहीं। वसंत ऋतु आने पर उनकी बोली से भेद तुरंत प्रकट हो जाता है।
५. रहिमन पानी राखिए, बिन पानी सब सून।
पानी गए न ऊबरै, मोती, मानुष, चून॥
अर्थ: मनुष्य को अपने जीवन में मान-मर्यादा (पानी) अवश्य बचाकर रखनी चाहिए; क्योंकि बिना पानी के मोती की चमक, मनुष्य का सम्मान और आटे का कोई अस्तित्व नहीं रह जाता।
जैसी परे सो सहि रहे, कहि रहीम यह देह।
धरती पर ही परत है, सीत घाम औ मेह॥