जिन खोजा तिन पाइया, गहरे पानी पैठ।
मैं बपुरा बूडन डरा, रहा किनारे बैठ॥
राम नाम की अमृत धारा, पावन करत जहान।
जाके सुमिरन ते सब सिध होई, गावत वेद पुरान॥
प्रभु चरनन की दासी विनवे, राखो अपनी छाँव।
भवसागर तर जावे प्राणी, लेत राम को नाँव॥
हरि के चरणन में सुख भारी, जहाँ बिराजे करुणा सारी।
भव के सागर तर जावेगा, सुमिरन कर ले बनवारी॥
सीता लखन संग वन विचरे, मुनि आश्रम पावन कीन्ह।
दुष्ट दलन सुर काज सँवारे, भक्तों को सुख दीन्ह॥
नाम तुम्हारा तारनहारा, जो जपे मिटे कलेश।
अंतर घट में बास करो प्रभु, मेटो सकल क्लेश॥
मीरा के प्रभु गिरधर नागर, हरहु कलेश हमार।
चरण कँवल की दासी मीरा, तारो भवजल पार॥