पतित पावन राम - शरणागत वत्सल संकीर्तन

अब्दुर्रहीम ख़ानख़ाना
श्री राम भजन भजन श्री राम
॥ दोहा ॥

जिन खोजा तिन पाइया, गहरे पानी पैठ।
मैं बपुरा बूडन डरा, रहा किनारे बैठ॥

॥ चौपाई ॥

राम नाम की अमृत धारा, पावन करत जहान।
जाके सुमिरन ते सब सिध होई, गावत वेद पुरान॥
प्रभु चरनन की दासी विनवे, राखो अपनी छाँव।
भवसागर तर जावे प्राणी, लेत राम को नाँव॥

हरि के चरणन में सुख भारी, जहाँ बिराजे करुणा सारी।
भव के सागर तर जावेगा, सुमिरन कर ले बनवारी॥

सीता लखन संग वन विचरे, मुनि आश्रम पावन कीन्ह।
दुष्ट दलन सुर काज सँवारे, भक्तों को सुख दीन्ह॥
नाम तुम्हारा तारनहारा, जो जपे मिटे कलेश।
अंतर घट में बास करो प्रभु, मेटो सकल क्लेश॥

॥ दोहा ॥

रहिमन विपदा हू भली, जो थोड़े दिन होय।
हित अनहित या जगत में, जानि परत सब कोय॥

सरल हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक महत्व

कविवर रहीम का यह नीति पद जीवन के व्यावहारिक सत्य, धैर्य और ईश्वर पर अटूट विश्वास की सीख देता है। इस पावन भजन में श्री राम के सत्यव्रत स्वरूप की स्तुति करते हुए साधक को अंतःकरण के विकारों से मुक्त होकर सच्चे आनंद की प्राप्ति का मार्ग दिखाया गया है।

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।