बरसाने की राधा रानी - वरद वरदायक रूप पद

संत रविदास
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॥ दोहा ॥

सुमिरन सार है नाम का, और सकल जंजाल।
आदि अंत सब देखिया, दूजा सब बेहाल॥

॥ चौपाई ॥

बरसाने की लाडली श्री राधा, कृपा दृष्टि बरसाओ।
श्यामा प्यारी भानुदुलारी, हृदय कमल में आओ॥
चरण शरण की दासी बना लो, प्रेम सुधा रस दीजै।
राधा नाम रटे जो निसिदिन, भव बंधन हरि लीजै॥

अमृत रस बरसे तेरे द्वारे, जो आए सो पार उतारे।
लाज राखि ले हे जगस्वामी, हम सब हैं तेरे सहारे॥

हारे के सहारे खाटू श्याम हमारे, लखदातार कन्हैया।
शीश के दानी शरण तुम्हारी, पार लगा दो नैया॥
फाल्गुन मेले भक्त पुकारे, निशान हाथ में सोहे।
तेरी कृपा से बिगड़े बनते, रूप अनुपम मोहे॥

॥ दोहा ॥

कहे रविदास खलास चमारा, जो परसै हरि चरण।
जाके घट में प्रेम बसे है, ताको प्रभु की शरण॥

सरल हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक महत्व

संत शिरोमणि रविदास जी का यह निर्मल भक्ति पद आडंबर रहित सात्विक हृदय और समरसता की आध्यात्मिक ज्योति प्रज्वलित करता है। इस पावन भजन में अन्य के दया निधि स्वरूप की स्तुति करते हुए साधक को अंतःकरण के विकारों से मुक्त होकर सच्चे आनंद की प्राप्ति का मार्ग दिखाया गया है।

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।