पूर्णब्रह्म स्तोत्रम्

पारंपरिक
श्री राम स्तोत्र Mantra Purnabramha Stotram Mantra
॥ पावन पाठ ॥

पूर्णचन्द्रमुखं निलेन्दु रूपम्

उद्भाषितं देवं दिव्यं स्वरूपम्

पूर्णं त्वं स्वर्णं त्वं वर्णं त्वं देवम्

पिता माता बंधु त्वमेव सर्वम्

जगन्नाथ स्वामी भक्तभावप्रेमी नमाम्यहम्

जगन्नाथ स्वामी भक्तभावप्रेमी नमाम्यहम् ॥ १ ॥

कुंचितकेशं च संचितवेशम्

वर्तुलस्थूलनयनं ममेशम्

पिनाकनीनाका नयनकोशम्

आकृष्ट ओष्ठं च उत्कृष्ट श्वासम्

जगन्नाथ स्वामी भक्तभावप्रेमी नमाम्यहम्

जगन्नाथ स्वामी भक्तभावप्रेमी नमाम्यहम् ॥ २ ॥

नीलाचले चंचलया सहितम्

आदिदेव निश्चलानंदे स्थितम्

आनन्दकन्दं विश्वविन्दुचंद्रम्

नंदनन्दनं त्वम् इन्द्रस्य इन्द्रम्

जगन्नाथ स्वामी भक्तभावप्रेमी नमाम्यहम्

जगन्नाथ स्वामी भक्तभावप्रेमी नमाम्यहम् ॥ ३ ॥

सृष्टि स्थिति प्रलय सर्वमूळम्

सूक्ष्मातिसुक्ष्मं त्वं स्थूलातिस्थूलम्

कांतिमयानन्तम् अन्तिमप्रान्तम्

प्रशांतकुन्तळं ते मूर्त्तिमंतम्

जगन्नाथ स्वामी भक्तभावप्रेमी नमाम्यहम्

जगन्नाथ स्वामी भक्तभावप्रेमी नमाम्यहम् ॥ ४ ॥

यज्ञ तप वेद ज्ञानात् अतीतम्

भावप्रेमछंदे सदावशित्वम्

शुद्धात् शुध्दं त्वं च पूर्णात् पूर्णम्

कृष्णमेघतुल्यम् अमूल्यवर्णम्

जगन्नाथ स्वामी भक्तभावप्रेमी नमाम्यहम्

जगन्नाथ स्वामी भक्तभावप्रेमी नमाम्यहम् ॥ ५ ॥

विश्वप्रकाशं सर्वक्लेशनाशम्

मन बुद्धि प्राण श्वासप्रश्वासम्

मत्स्य कूर्म नृसिंह वामनः त्वम्

वराह राम अनंत अस्तित्वम्

जगन्नाथ स्वामी भक्तभावप्रेमी नमाम्यहम्

जगन्नाथ स्वामी भक्तभावप्रेमी नमाम्यहम् ॥ ६ ॥

ध्रुवस्य विष्णु त्वं भक्तस्य प्राणम्

राधापति देव हे आर्त्तत्राणम्

सर्व ज्ञान सारं लोक आधारम्

भावसंचारम् अभावसंहारम्

जगन्नाथ स्वामी भक्तभावप्रेमी नमाम्यहम्

जगन्नाथ स्वामी भक्तभावप्रेमी नमाम्यहम् ॥ ७ ॥

बलदेव सुभद्रा पार्श्वे स्थितम्

सुदर्शन संगे नित्य शोभितम्

नमामि नमामि सर्वांगे देवम्

हे पूर्णब्रह्म हरि मम सर्वम्

जगन्नाथ स्वामी भक्तभावप्रेमी नमाम्यहम्

जगन्नाथ स्वामी भक्तभावप्रेमी नमाम्यहम् ॥ ८ ॥

कृष्णदासहृदि भाव संचारम्

सदा कुरु स्वामी तव किंकरम्

तव कृपा विन्दु हि एक सारम्

अन्यथा हे नाथ सर्व असारम्

जगन्नाथ स्वामी भक्तभावप्रेमी नमाम्यहम्

जगन्नाथ स्वामी भक्तभावप्रेमी नमाम्यहम् ॥ ९ ॥

॥ दोहा ॥

॥ इति श्री कृष्णदासः विरचित पूर्णब्रह्न स्तोत्रम् सम्पूर्णम् ॥

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।