जिन खोजा तिन पाइया, गहरे पानी पैठ।
मैं बपुरा बूडन डरा, रहा किनारे बैठ॥
ॐ सूर्याय नमः मंत्र जपते, मिटत असाध्य कलेश।
भक्ति भाव से जो जल अर्पे, पावत सुख अशेष॥
प्रत्यक्ष देव भुवन के स्वामी, भास्कर ज्योति अपारा।
कोटि कोटि वंदन हे दिनकर, सब जग का उजियारा॥
हरि के चरणन में सुख भारी, जहाँ बिराजे करुणा सारी।
भव के सागर तर जावेगा, सुमिरन कर ले बनवारी॥
सप्त अश्व रथ पर असवारी, अरुण सारथी आगे।
उदित भानु जब तिमिर नशावे, सकल जीव सब जागे॥
तेज पुंज आदित्य दिवाकर, नमन करत संसारा।
आरोग्य धन वैभव दीजो, प्रभु तुम प्राण अधारा॥
तुका म्हणे विट्ठल नाम, तारी सकल भुवन।
प्रेम भावे कीर्तन करितां, पावे समाधान॥