प्रथमेनार्जिता विद्या.. (Prathame Narjita Vidya..)

पारंपरिक
अन्य मंत्र Mantra Vedic Mantra
॥ पावन पाठ ॥

प्रथमेनार्जिता विद्या,

द्वितीयेनार्जितं धनं ।

तृतीयेनार्जितः कीर्तिः,

चतुर्थे किं करिष्यति ॥

सरल रूपांतरण:

प्रथमे नार्जिता विद्या,

द्वितीये नार्जितं धनम् ।

तृतीये नार्जितं पुण्यं,

चतुर्थे किं करिष्यति ॥

हिन्दी भावार्थ:

जिस व्यक्ति ने, पहले आश्रम (ब्रम्हचर्य) में विद्या अर्जित नहीं की। दूसरे आश्रम (गृहस्थ) में धन अर्जित नहीं किया। तीसरे आश्रम (वानप्रस्थ) में पुण्य अर्जित नहीं किया। हे मनुष्य अब चौथे आश्रम (सन्यास) में क्या करोगे?

अर्थात- मनुष्य के जीवन में चार आश्रम होते है ब्रम्हचर्य, गृहस्थ ,वानप्रस्थ और सन्यास। जिसने पहले तीन आश्रमों में निर्धारित कर्तव्य का पालन किया, उसे चौथे आश्रम / सन्यास में मोक्ष के लिए प्रयास नहीं करना पड़ता है।

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।