माला फेरत जुग भया, फिरा न मन का फेर।
कर का मनका डारि दे, मन का मनका फेर॥
पान चढ़े फूल चढ़े और चढ़े मेवा।
लड्डुअन का भोग लगे संत करें सेवा॥
अंधन को आँख देत कोढ़िन को काया।
बांझन को पुत्र देत निर्धन को माया॥
ज्योति स्वरूप अखंड तुम्हारा, जग का पालनहार दुलारा।
अंधकार से मुक्ति दीजो, प्रभु तुम प्राण अधारा॥
पान चढ़े फूल चढ़े और चढ़े मेवा।
लड्डुअन का भोग लगे संत करें सेवा॥
अंधन को आँख देत कोढ़िन को काया।
बांझन को पुत्र देत निर्धन को माया॥
रहिमन विपदा हू भली, जो थोड़े दिन होय।
हित अनहित या जगत में, जानि परत सब कोय॥