॥ दोहा ॥
पायो जी मैंने राम रतन धन पायो।
वस्तु अमोलक दी मेरे सतगुरु, किरपा करि अपनायो॥
॥ चौपाई ॥
जनम-जनम की पूंजी पाई, जग में सभी खोवायो।
पायो जी मैंने राम रतन धन पायो...
खरचै नहिं कोई चोर न लेवै, दिन-दिन बढ़त सवायो।
पायो जी मैंने राम रतन धन पायो...
सत की नाव खेवटिया सतगुरु, भवसागर तरि आयो।
पायो जी मैंने राम रतन धन पायो...
मीरा के प्रभु गिरधर नागर, हरषि-हरषि जस गायो।
पायो जी मैंने राम रतन धन पायो...
॥ दोहा ॥
अमोलक धन यह राम नाम का, जो पावे सो तरि जाय।
कहत कबीर अरु कहत मीरा, हरि भजि मुक्ति पाय॥