पंच परमेष्ठी आरती

संत सूरदास
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॥ पावन पाठ ॥

इह विधि मंगल आरति कीजे,

पंच परमपद भज सुख लीजे ।

इह विधि मंगल आरति कीजे,

पंच परमपद भज सुख लीजे ॥

पहली आरति श्रीजिनराजा,

भव दधि पार उतार जिहाजा ।

इह विधि मंगल आरति कीजे,

पंच परमपद भज सुख लीजे ॥

दूसरी आरति सिद्धन केरी,

सुमिरन करत मिटे भव फेरी ।

इह विधि मंगल आरति कीजे,

पंच परमपद भज सुख लीजे ॥

तीजी आरति सूरि मुनिंदा,

जनम मरन दु:ख दूर करिंदा ।

इह विधि मंगल आरति कीजे,

पंच परमपद भज सुख लीजे ॥

चौथी आरति श्री उवझाया,

दर्शन देखत पाप पलाया ।

इह विधि मंगल आरति कीजे,

पंच परमपद भज सुख लीजे ॥

पाँचमि आरति साधु तिहारी,

कुमति विनाशन शिव अधिकारी ।

इह विधि मंगल आरति कीजे,

पंच परमपद भज सुख लीजे ॥

छट्ठी ग्यारह प्रतिमाधारी,

श्रावक वंदूं आनंदकारी ।

इह विधि मंगल आरति कीजे,

पंच परमपद भज सुख लीजे ॥

सातमि आरति श्रीजिनवानी,

‘द्यानत’ सुरग मुकति सुखदानी ।

इह विधि मंगल आरति कीजे,

॥ दोहा ॥

पंच परमपद भज सुख लीजे ॥

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।