महाकाल शंभू - भस्म विभूषित रूप संकीर्तन

मीरा बाई
महादेव भजन भजन महादेव शिव
॥ दोहा ॥

सुमिरन सार है नाम का, और सकल जंजाल।
आदि अंत सब देखिया, दूजा सब बेहाल॥

॥ चौपाई ॥

भस्म अंग पर शोभित सोहे, नंदी की असवारी।
पार्वती संग राजत गिर पर, त्रिपुरारी सुखकारी॥
विष प्याला पी जग को तारा, नीलकंठ कहलाए।
दीन दुखियन पर दया करत नित, शिव शंकर मन भाये॥

अमृत रस बरसे तेरे द्वारे, जो आए सो पार उतारे।
लाज राखि ले हे जगस्वामी, हम सब हैं तेरे सहारे॥

जटा जूट में गंगा सोहे, भाल तिलक शशि चंदा।
गले सर्प की माला चमके, मेटत भव के फंदा॥
डम डम डमरू बाजत भारी, नाचत नटराज धीर।
चरण शरण में आयो सेवक, हरो हमारी पीर॥

॥ दोहा ॥

मीरा के प्रभु गिरधर नागर, हरहु कलेश हमार।
चरण कँवल की दासी मीरा, तारो भवजल पार॥

सरल हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक महत्व

भक्त शिरोमणि मीरा बाई का यह अनन्य प्रेम पद सांसारिक बंधनों से मुक्ति और प्रभु गिरधर के चरणों में पूर्ण समर्पण का संदेश देता है। इस पावन भजन में महादेव शिव के मृत्युंजय स्वरूप की स्तुति करते हुए साधक को अंतःकरण के विकारों से मुक्त होकर सच्चे आनंद की प्राप्ति का मार्ग दिखाया गया है।

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।