सुमिरन सार है नाम का, और सकल जंजाल।
आदि अंत सब देखिया, दूजा सब बेहाल॥
भस्म अंग पर शोभित सोहे, नंदी की असवारी।
पार्वती संग राजत गिर पर, त्रिपुरारी सुखकारी॥
विष प्याला पी जग को तारा, नीलकंठ कहलाए।
दीन दुखियन पर दया करत नित, शिव शंकर मन भाये॥
अमृत रस बरसे तेरे द्वारे, जो आए सो पार उतारे।
लाज राखि ले हे जगस्वामी, हम सब हैं तेरे सहारे॥
जटा जूट में गंगा सोहे, भाल तिलक शशि चंदा।
गले सर्प की माला चमके, मेटत भव के फंदा॥
डम डम डमरू बाजत भारी, नाचत नटराज धीर।
चरण शरण में आयो सेवक, हरो हमारी पीर॥
तुलसीदास रघुनाथ शरण में, सदा रहे अनुराग।
जाके हृदय राम बसे हैं, सोई परम बड़भाग॥