सिंहवाहिनी दुर्गा - ज्योति स्वरूप माता आराधना

संत तुकाराम
माता दुर्गा भजन भजन माता दुर्गा
॥ दोहा ॥

पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुआ, पंडित भया न कोय।
ढाई आखर प्रेम का, पढ़े सो पंडित hoy॥

॥ चौपाई ॥

दयामयी माँ कृपा कीजिये, दीन हीन संताने।
तेरे सिवा जग में कोई नाहिं, जो अंतर्मन जाने॥
जय जय दुर्गे मात भवानी, संकट हरणी माता।
चरणन में नित शीश नवाऊँ, हे सुख सम्पत्ति दाता॥

संत समागम परम सुहाई, जहाँ मिले अमृत की थाई।
काम क्रोध मद लोभ मिटावे, निर्मल ज्ञान समाई॥

लाल चुनरिया माँ के सोहे, दीप शिखा उजियारा।
जो ध्यावे सो फल पावे, मिटे कलेश अपारा॥
द्वार तिहारे जो नर आवे, झोली भर ले जावे।
कल्याणी जगदम्बा शेरावाली, सब सुख संपति पावे॥

॥ दोहा ॥

तुका म्हणे विट्ठल नाम, तारी सकल भुवन।
प्रेम भावे कीर्तन करितां, पावे समाधान॥

सरल हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक महत्व

वारकरी संप्रदाय के संत तुकाराम जी का यह अभंग विट्ठल नाम के संकीर्तन से अंतःकरण की शुद्धि और परम शांति का मार्ग दर्शाता है। इस पावन भजन में माता दुर्गा के अभय प्रदायिनी स्वरूप की स्तुति करते हुए साधक को अंतःकरण के विकारों से मुक्त होकर सच्चे आनंद की प्राप्ति का मार्ग दिखाया गया है।

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।