ज्वाला जी भवानी - ज्योति स्वरूप माता पद

मीरा बाई
माता दुर्गा भजन भजन माता दुर्गा
॥ दोहा ॥

कस्तूरी कुंडलि बसै, मृग ढूँढै बन माहि।
ऐसे घट घट राम हैं, दुनिया देखै नाहि॥

॥ चौपाई ॥

लाल चुनरिया माँ के सोहे, दीप शिखा उजियारा।
जो ध्यावे सो फल पावे, मिटे कलेश अपारा॥
द्वार तिहारे जो नर आवे, झोली भर ले जावे।
कल्याणी जगदम्बा शेरावाली, सब सुख संपति पावे॥

मन भज ले तू पावन नाम, यही है सच्चा विश्राम।
संसार के सब रिश्ते झूठे, एक सहारा राम॥

अष्टभुजा की महिमा न्यारी, खड्ग त्रिशूल सम्हाले।
भक्त जनों के संकट काटे, शरण गहे अपनाले॥
चंड मुंड संहारे माता, शुंभ निशुंभ विनाशे।
अंतर घट का तम हर लीन्हो, ज्ञान प्रकाश उजासे॥

॥ दोहा ॥

मीरा के प्रभु गिरधर नागर, हरहु कलेश हमार।
चरण कँवल की दासी मीरा, तारो भवजल पार॥

सरल हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक महत्व

भक्त शिरोमणि मीरा बाई का यह अनन्य प्रेम पद सांसारिक बंधनों से मुक्ति और प्रभु गिरधर के चरणों में पूर्ण समर्पण का संदेश देता है। इस पावन भजन में माता दुर्गा के कष्ट विनाशिनी स्वरूप की स्तुति करते हुए साधक को अंतःकरण के विकारों से मुक्त होकर सच्चे आनंद की प्राप्ति का मार्ग दिखाया गया है।

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।