श्री नारायण गुरु

पारंपरिक
महादेव संत साहित्य Bhakt Sree Narayana Guru Bhakt
॥ पावन पाठ ॥

भक्तमाल | श्री नारायण गुरु

असली नाम - नारायणन

अन्य नाम - नानू, श्री नारायण गुरु स्वामी

आराध्य - भगवान शिव

गुरु - रमण पिल्लई आसन

जन्मतिथि - 20 अगस्त 1856

जन्म स्थान - तिरुवनंतपुरम, केरल

वैवाहिक स्थिति - अविवाहित

भाषा - संस्कृत, मलयालम, तमिल, अंग्रेजी

पिता - मदन आसन

माता - कुट्टियाम्मा

दर्शन - अद्वैत वेदांत

प्रसिद्ध - केरल सुधार आन्दोलन

श्री नारायण गुरु भारत में एक दार्शनिक, आध्यात्मिक नेता और समाज सुधारक थे। उन्होंने आध्यात्मिक ज्ञान और सामाजिक समानता को बढ़ावा देने के लिए केरल के जाति-ग्रस्त समाज में अन्याय के खिलाफ सुधार आंदोलन का नेतृत्व किया था।

उनका एक उद्धरण जो उनके आंदोलन को परिभाषित करता था वह था "सभी मनुष्यों के लिए एक जाति, एक धर्म और एक भगवान।" कम उम्र से ही वह तपस्या की ओर आकर्षित हो गये थे। वह आठ वर्षों तक जंगल में एक सन्यासी के रूप में रहे। उन्होंने वेद, उपनिषद, साहित्य, संस्कृत की तार्किक शब्दावली, हठ योग और अन्य दर्शन सीखे।

वह अद्वैत कविता दैव दसकम के लेखक हैं, जो केरल में सामुदायिक प्रार्थना के लिए सबसे अधिक इस्तेमाल की जाने वाली कविताओं में से एक है। 1888 में, उन्होंने अरुविप्पुरम में भगवान शिव को समर्पित एक मंदिर बनवाया जो उस समय के जाति-आधारित प्रतिबंधों के खिलाफ था। उन्होंने विभिन्न भाषाओं में विभिन्न पुस्तकें लिखीं। 21 अगस्त 1967 को, नारायण गुरु के सम्मान में भारतीय डाक टिकट जारी किया गया था। भारतीय रिज़र्व बैंक और सिक्योरिटी प्रिंटिंग एंड मिंटिंग कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया ने गुरु की 150वीं जयंती के अवसर पर उनकी छवि वाले स्मारक सिक्कों के दो सेट जारी किए, जिनमें से प्रत्येक का मूल्य क्रमशः ₹5 और ₹100 था।

वह अद्वैत वेदांत के सबसे महान समर्थकों और पुनर्मूल्यांकनकर्ताओं में से एक बन गए, जो आदि शंकराचार्य द्वारा प्रस्तुत गैर-द्वैत का सिद्धांत था। 20 सितंबर, 1928 को उनकी मृत्यु हो गई और उस दिन को केरल में श्री नारायण गुरु समाधि के रूप में मनाया जाता है।

सरल हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक महत्व

श्री नारायण गुरु | Shri Narayana Guru

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।