सृष्टिकर्ता हरि - गरुड़ सवार कृपा वंदना

संत सूरदास
विष्णु भगवान भजन भजन विष्णु भगवान
॥ दोहा ॥

ऐसी बानी बोलिए, मन का आपा खोय।
औरन को सीतल करै, आपहु सीतल hoy॥

॥ चौपाई ॥

शंख चक्र गदा पद्म विराजे, चार भुजा अति सोहे।
गरुड़ सवार कृपा के सागर, सुर नर मुनि मन मोहे॥
पालनहार सकल जग के तुम, संकट काटनहारे।
शरणागत की रक्षा कीजे, हे प्रभु श्रीपत प्यारे॥

नाम जपे से पाप नशावे, जन्म मरण के फेर मिटावे।
संतन के संग मन रंग लीजै, जीवन सफल बनावे॥

शांत आकारं भुजग शयनं पद्मनाभं सुरेशं।
विश्वाधारं गगन सदृशं मेघवर्णं शुभांगम्॥
लक्ष्मीकांतं कमलनयनं योगिभिर्ध्यानगम्यं।
वंदे विष्णुं भवभयहरं सर्वलोकैकनाथम्॥

॥ दोहा ॥

सूरदास प्रभु तुम्हरे दरश बिन, नैनन चैन न पावे।
श्यामल सुंदर बाल रूप लखि, कोटि मदन शरमावे॥

सरल हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक महत्व

महाकवि सूरदास जी का यह पद ब्रज रस और वात्सल्य भाव से परिपूर्ण है, जिसमें प्रभु के दिव्य रूप का साक्षात्कार कराया गया है। इस पावन भजन में विष्णु भगवान के शंख चक्र गदा पद्म धारी स्वरूप की स्तुति करते हुए साधक को अंतःकरण के विकारों से मुक्त होकर सच्चे आनंद की प्राप्ति का मार्ग दिखाया गया है।

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।