कस्तूरी कुंडलि बसै, मृग ढूँढै बन माहि।
ऐसे घट घट राम हैं, दुनिया देखै नाहि॥
ब्रज की वीथिन नाचत डोलत, पायन बाजत नूपुर।
जो ध्यावे सोई सुख पावे, भर देवत मन कूपुर॥
दीनबंधु दीनन के दाता, सुनों हमारी टेर।
भवसागर मँझधार पड़ी नैया, अब मत कीजो देर॥
मन भज ले तू पावन नाम, यही है सच्चा विश्राम।
संसार के सब रिश्ते झूठे, एक सहारा राम॥
गोप गोपिका संग बिराजे, सुरभिन के रखवार।
प्रेम सुधा बरसावत मोहन, जग के पालनहार॥
अंतर घट में ज्योति जगाई, दूर करो अंधियारा।
तेरे नाम की लगन लगी है, तुम ही प्राण अधारा॥
हरि ॐ तत्सत् नारायण, वासुदेव सुख रास।
जो यह पद निशदिन सुने, पूरे मन की आस॥