॥ दोहा ॥
अंग अंग में रम गयो, मोहन मदन गोपाल।
नैनन मूंदि लखूं सदा, छवि अति परम रसाल॥
॥ चौपाई ॥
नैनन में श्याम समायो री, मोहे सुध बुध ना बिसरायो री।
सांवरी मूरत मन में बसी, प्रेम सुधा रस छायो री॥
सब सखियाँ मिल मंगल गावें, कान्हा संग रंग लायो री।
मोर मुकुट पीतांबर धारी, चितचोर बनवारी भायो री॥
नैनन में श्याम समायो री॥
॥ दोहा ॥
जाके घट में श्याम बसे, सोई परम धनवान।
साध्वी पूर्णिमा कहत है, पायो पद निर्वाण॥