॥ दोहा ॥
नैनन बान चलाय के, घायल कियो सुजान।
चित्र विचित्र के हिय बस्यो, सुंदर चतुर सुजान॥
॥ चौपाई ॥
नैनन में श्याम समाए गयो।
मोहे प्रेम को रोग लगाए गयो॥
नैनन में श्याम समाए गयो॥
जब से देखि बांकी मूरत।
मन में बसी सांवरी सूरत॥
सुधबुध सारी भुलाए गयो।
मोहे प्रेम को रोग लगाए गयो॥
यमुना तट पे मुरली बजावे।
मीठी तान से मन को लुभावे॥
अपना दास बनाए गयो।
मोहे प्रेम को रोग लगाए गयो॥
चित्र विचित्र कहे बनवारी।
मैं तो हो गई तेरी पुजारी॥
अमृत रस बरसाए गयो।
मोहे प्रेम को रोग लगाए गयो॥
॥ दोहा ॥
प्रेम रोग यह सांवरो, औषध नहिं संसार।
चित्र विचित्र शरण में, पायो सुख अपार॥