नाहर सिंह पाण्डे जी का दूत कार्य -
गोगाजी ने नाहर सिंह पाण्डे को जब राजदूत के कर्तव्य का निर्वहन करने हेतु काबुल भेजा तो पीढ़ी दर पीढ़ी चली आ रही मौखिक कथाओ के आधार पर विरचित पुरानी पुस्तको का यह गीत आला उदल की तर्ज़ पर भक्तो की जुबान पर सुना जा सकता है।
जहा कचहरी लगी हुई थी, नरसिंह पाण्डे पहुंच जाये ।
शोभा आ रही दरबार में, जिसका हॉल कहा न जाये ।
कुर्सी कुर्सी पर थे शहजादे, मूढे मूढे पर सरदार ।
कड़का कर रहे डोम वहाँ पर, उनकी रहे तारीफ सुनय ।
नरसिंह पाण्डे ने जा कर के सबको दीना शीश छुकाय ।
साथ हाथ के सिहासन पर बैठे सरवर और सुल्तान ।
चिठ्ठी दे दी जा नरसिंह ने सभी भूल गए ओसन ।
चिठ्ठी पढ़ी तभी उन्होंने भाई सुन लो कान लगाए ।
जैसी चिठ्ठी लिखकर आई सबको दू में सुनाय ।
सात पांच को नरसिंह मारे दीनी थी मारा मार मचाय ।
तीन सौ जवान मरे सरवर के सब दल तिड़ीबीड़ी हो जाए ।
जब ये देखा है नरसिंह ने अपना घोडा दिया बढ़ाए ।
काले बादल की लाली में जैसे कला कबूतर खाए ।
सर सर सर सर उड़ता जावे अम्बर पंख दिए फैलाय ।
तब्बू लग रहे जहा देवो के घोडा निचे उतरा है जाए ।