ऐसी बानी बोलिए, मन का आपा खोय।
औरन को सीतल करै, आपहु सीतल hoy॥
मैया मोरी माखन खायो, ग्वाल सखा सब संग।
बाल चरित लीला मनहारी, उपजत प्रेम तरंग॥
चरण शरण में आयो प्रभू जी, तारो भव जल पार।
साधु संत सब शीश नवावें, महिमा अपरंपार॥
नाम जपे से पाप नशावे, जन्म मरण के फेर मिटावे।
संतन के संग मन रंग लीजै, जीवन सफल बनावे॥
मोर मुकुट पीतांबर धारे, नैनन रूप अनूप।
दर्शन पावत ही मिट जावे, यह माया को रूप॥
अंग अंग छवि अति मनभावन, रूप अनुपम न्यारा।
भक्तों का संताप मिटावे, नंदनंदन प्यारा॥
नानक नाम जहाज है, चढ़े सो उतरे पार।
जो सरधा कर सेवदे, तिन भवजल तारणहार॥