॥ दोहा ॥
मोर मुकुट पीतांबर सोहे गल बैजंती माल।
मृदुल कृष्ण के नयन बसे श्री बांकेबिहारी लाल॥
॥ चौपाई ॥
मुकुट सिर मोर का, मेरे चितचोर का।
बड़ा प्यारा लगे रूप नंदकिशोर का॥
मुकुट सिर मोर का, मेरे चितचोर का॥
घुंघराले बाल लट लटके कपोल पे।
मोहिनी मुरलिया बाजे मीठे बोल पे॥
जादू चलावे कान्हा माखन चोर का।
बड़ा प्यारा लगे रूप नंदकिशोर का॥
कजरारे नैन तिरछी चितवन सुहानी।
देख देख रूप भई सुधबुध दिवानी॥
बंधन निराला है प्रेम की डोर का।
बड़ा प्यारा लगे रूप नंदकिशोर का॥
मृदुल कृष्ण कहत छवि अति सुखदाई।
कोटि काम लजावत सुंदरता पाई॥
दरश दिखा दे प्यारे आज भोर का।
बड़ा प्यारा लगे रूप नंदकिशोर का॥
॥ दोहा ॥
चितचोर मनमोहन कन्हाई, रूप अनूप रसाल।
मृदुल कृष्ण बलिहारी जावे, जय जय मदन गोपाल॥