पतितपावनी माँ गंगा - चरण शरण दे मैया संकीर्तन

संत रविदास
माँ गंगा भजन भजन माँ गंगा
॥ दोहा ॥

सुमिरन सार है नाम का, और सकल जंजाल।
आदि अंत सब देखिया, दूजा सब बेहाल॥

॥ चौपाई ॥

हरिद्वार काशी प्रयागराज, तट पर दीप उजाले।
आरती करत सकल संसारा, संकट सकल विडाले॥
जय माँ गंगे पावन मैया, निर्मल तोय तुम्हारा।
अंतिम काल शरण में लीजो, हे जीवन आधारा॥

अमृत रस बरसे तेरे द्वारे, जो आए सो पार उतारे।
लाज राखि ले हे जगस्वामी, हम सब हैं तेरे सहारे॥

शिव जटा से निकली गंगा, भगीरथ तप से आई।
सकल लोक का पाप बहाकर, मुक्ति धाम बनाई॥
शीतल पावन धार तुम्हारी, जो नर डुबकी लावे।
जन्म मरण के बंधन टूटे, परम पद सो पावे॥

॥ दोहा ॥

कहे रविदास खलास चमारा, जो परसै हरि चरण।
जाके घट में प्रेम बसे है, ताको प्रभु की शरण॥

सरल हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक महत्व

संत शिरोमणि रविदास जी का यह निर्मल भक्ति पद आडंबर रहित सात्विक हृदय और समरसता की आध्यात्मिक ज्योति प्रज्वलित करता है। इस पावन भजन में माँ गंगा के मोक्ष प्रदात्री स्वरूप की स्तुति करते हुए साधक को अंतःकरण के विकारों से मुक्त होकर सच्चे आनंद की प्राप्ति का मार्ग दिखाया गया है।

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।