॥ दोहा ॥
नेह लगायो सांवरे, कुल की कानि बहाय।
जो जाने सो प्रेम रस, जग क्या जाने हाय॥
॥ चौपाई ॥
मोहन से दिल क्यूं लगाया है, ये मैं जानूं या वो जाने।
छलिया पे दिल क्यूं आया है, ये मैं जानूं या वो जाने॥
हर बात निराली है उसकी, हर बात में उसका प्यार भरा।
लुट गई मैं उस सांवरे पे, तन मन सब वार दिया सारा॥
दुनिया वाले तो कहते हैं, दीवाना मुझको कहते हैं।
इस पागल दिल को क्या समझाएं, जो श्याम नाम ही रटते हैं॥
मोहन से दिल क्यूं लगाया है, ये मैं जानूं या वो जाने॥
॥ दोहा ॥
प्रेम दीवानी हो गई, सुध बुध रही न काय।
साध्वी पूर्णिमा कहत है, मोहन शरण समाए॥