॥ दोहा ॥
राधा नाम परम सुखदाई, अमृत रस की खान।
इंद्रेश जपत मगन रहे, पावे प्रेम विहान॥
॥ चौपाई ॥
मीठे रस से भरयो री, राधा रानी लागे।
महारानी लागे, मन भावनी लागे॥
मीठे रस से भरयो री, राधा रानी लागे॥
ना भावे मन को यमुना जी को पानी।
काहे कि सांवरो है कारो रे कन्हैया॥
गोरी गोरी राधा जी सुहानी लागे।
मीठे रस से भरयो री, राधा रानी लागे॥
बरसाने की रानी राधा, त्रिभुवन की महारानी।
कान्हा जिनकी चरण दबाये, ऐसी पटरानी॥
ब्रज मंडल की ये तो ठकुरानी लागे।
मीठे रस से भरयो री, राधा रानी लागे॥
इंद्रेश कहे श्यामा प्यारी।
तुम पर वारे कुंजबिहारी॥
भक्ति रस अमृत बरसावनी लागे।
मीठे रस से भरयो री, राधा रानी लागे॥
॥ दोहा ॥
वृषभानु कुंवरी लाडली, त्रिभुवन वंदन जोग।
इंद्रेश पावे सदा, राधा प्रेम संजोग॥