माला फेरत जुग भया, फिरा न मन का फेर।
कर का मनका डारि दे, मन का मनका फेर॥
शिव जटा से निकली गंगा, भगीरथ तप से आई।
सकल लोक का पाप बहाकर, मुक्ति धाम बनाई॥
शीतल पावन धार तुम्हारी, जो नर डुबकी लावे।
जन्म मरण के बंधन टूटे, परम पद सो पावे॥
ज्योति स्वरूप अखंड तुम्हारा, जग का पालनहार दुलारा।
अंधकार से मुक्ति दीजो, प्रभु तुम प्राण अधारा॥
हरिद्वार काशी प्रयागराज, तट पर दीप उजाले।
आरती करत सकल संसारा, संकट सकल विडाले॥
जय माँ गंगे पावन मैया, निर्मल तोय तुम्हारा।
अंतिम काल शरण में लीजो, हे जीवन आधारा॥
नानक नाम जहाज है, चढ़े सो उतरे पार।
जो सरधा कर सेवदे, तिन भवजल तारणहार॥