मन लाग्यो मेरो यार फकीरी में (कबीर भजन)

संत कबीरदास
अन्य भजन भजन कबीर
॥ दोहा ॥

मन लाग्यो मेरो यार फकीरी में।
जो सुख पायो राम भजन में, सो सुख नाहिं अमीरी में॥

॥ चौपाई ॥

मन लाग्यो मेरो यार फकीरी में॥

भलो बुरो सब कोउ कहि लीजै, सब कुछ सहनो शरीरी में।
प्रेम नगर में रहनी हमारी, भली बनी इस जीरी में॥
मन लाग्यो मेरो यार फकीरी में...

हाथ में कुंडी बगल में सोटा, चारों दिशा जागीरी में।
कहैं कबीर सुनो भाई साधो, साहिब मिले सबूरी में॥
मन लाग्यो मेरो यार फकीरी में...

ना कछु लेना ना कछु देना, मगन रहैं हरि धीरी में।
जो सुख पायो राम भजन में, सो सुख नाहिं अमीरी में॥

॥ दोहा ॥

कबीरा सब जग निर्धना, धनवंता नहीं कोय।
धनवंता सोई जानिये, जाके राम नाम धन होय॥

सरल हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक महत्व

संत कबीर का यह कालजयी भजन सांसारिक संपदा के झूठे सुख के स्थान पर आत्म-संतोष, वैराग्य और राम-भक्ति के शाश्वत आनंद का गान करता है।

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।