मन को कभी भी निराश न होने दें - प्रेरक कहानी

पारंपरिक
विष्णु भगवान कथा Prerak-kahani Bikhari Prerak-kahani
॥ पावन पाठ ॥

सुबह होते ही, एक भिखारी सेठजी के घर पर भिक्षा मांगने के लिए पहुँच गया। भिखारी ने दरवाजा खटखटाया, सेठजी बाहर आये पर उनकी जेब में देने के लिए कुछ न निकला। वे कुछ दुखी होकर घर के अंदर गए और एक बर्तन उठाकर भिखारी को दे दिया।

भिखारी के जाने के थोड़ी देर बाद ही वहां सेठजी की पत्नी आई और बर्तन न पाकर चिल्लाने लगी: अरे! क्या कर दिया आपने चांदी का बर्तन भिखारी को दे दिया। दौड़ो-दौड़ो और उसे वापिस लेकर आओ।

सेठजी दौड़ते हुए गए और भिखारी को रोक कर कहा: भाई मेरी पत्नी ने मुझे जानकारी दी है कि यह गिलास चांदी का है, कृपया इसे सस्ते में मत बेच दीजियेगा।

वहीँ पर खड़े सेठजी के एक मित्र ने उससे पूछा: मित्र! जब आपको पता चल गया था कि ये गिलास चांदी का है तो भी उसे गिलास क्यों ले जाने दिया?

सेठजी ने मुस्कुराते हुए कहा: मन को इस बात का अभ्यस्त बनाने के लिए कि वह बड़ी से बड़ी हानि में भी कभी दुखी और निराश न हो!

मन को कभी भी निराश न होने दें, बड़ी से बड़ी हानि में भी प्रसन्न रहें। मन उदास हो गया तो आपके कार्य करने की गति धीमी हो जाएगी। इसलिए मन को हमेशा प्रसन्न रखने का प्रयास।

सरल हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक महत्व

प्रेरक कहानी: मन को कभी भी निराश न होने दें! - Prerak Kahani: Man Ko Kabhi Bhi Nirash Na Hone Den

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।