पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुआ, पंडित भया न कोय।
ढाई आखर प्रेम का, पढ़े सो पंडित hoy॥
मोर मुकुट पीतांबर धारे, नैनन रूप अनूप।
दर्शन पावत ही मिट जावे, यह माया को रूप॥
अंग अंग छवि अति मनभावन, रूप अनुपम न्यारा।
भक्तों का संताप मिटावे, नंदनंदन प्यारा॥
संत समागम परम सुहाई, जहाँ मिले अमृत की थाई।
काम क्रोध मद लोभ मिटावे, निर्मल ज्ञान समाई॥
ब्रज की वीथिन नाचत डोलत, पायन बाजत नूपुर।
जो ध्यावे सोई सुख पावे, भर देवत मन कूपुर॥
दीनबंधु दीनन के दाता, सुनों हमारी टेर।
भवसागर मँझधार पड़ी नैया, अब मत कीजो देर॥
कहे रविदास खलास चमारा, जो परसै हरि चरण।
जाके घट में प्रेम बसे है, ताको प्रभु की शरण॥