जिन खोजा तिन पाइया, गहरे पानी पैठ।
मैं बपुरा बूडन डरा, रहा किनारे बैठ॥
मैया मोरी माखन खायो, ग्वाल सखा सब संग।
बाल चरित लीला मनहारी, उपजत प्रेम तरंग॥
चरण शरण में आयो प्रभू जी, तारो भव जल पार।
साधु संत सब शीश नवावें, महिमा अपरंपार॥
हरि के चरणन में सुख भारी, जहाँ बिराजे करुणा सारी।
भव के सागर तर जावेगा, सुमिरन कर ले बनवारी॥
मोर मुकुट पीतांबर धारे, नैनन रूप अनूप।
दर्शन पावत ही मिट जावे, यह माया को रूप॥
अंग अंग छवि अति मनभावन, रूप अनुपम न्यारा।
भक्तों का संताप मिटावे, नंदनंदन प्यारा॥
कहे रविदास खलास चमारा, जो परसै हरि चरण।
जाके घट में प्रेम बसे है, ताको प्रभु की शरण॥