शेरावाली अम्बे माँ - ज्योति स्वरूप माता वंदना

मीरा बाई
माता दुर्गा भजन भजन माता दुर्गा
॥ दोहा ॥

ऐसी बानी बोलिए, मन का आपा खोय।
औरन को सीतल करै, आपहु सीतल hoy॥

॥ चौपाई ॥

अष्टभुजा की महिमा न्यारी, खड्ग त्रिशूल सम्हाले।
भक्त जनों के संकट काटे, शरण गहे अपनाले॥
चंड मुंड संहारे माता, शुंभ निशुंभ विनाशे।
अंतर घट का तम हर लीन्हो, ज्ञान प्रकाश उजासे॥

नाम जपे से पाप नशावे, जन्म मरण के फेर मिटावे।
संतन के संग मन रंग लीजै, जीवन सफल बनावे॥

सिंह सवार विराजे मैया, हाथन आयुध सोहे।
शीश मुकुट कुंडल छवि भारी, सुर नर मुनि मन मोहे॥
दुष्ट दलन हे आदि भवानी, जग की पालनहारी।
महिमा अपरंपार तुम्हारी, जाऊं मैं बलिहारी॥

॥ दोहा ॥

मीरा के प्रभु गिरधर नागर, हरहु कलेश हमार।
चरण कँवल की दासी मीरा, तारो भवजल पार॥

सरल हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक महत्व

भक्त शिरोमणि मीरा बाई का यह अनन्य प्रेम पद सांसारिक बंधनों से मुक्ति और प्रभु गिरधर के चरणों में पूर्ण समर्पण का संदेश देता है। इस पावन भजन में माता दुर्गा के असुर संहारिणी स्वरूप की स्तुति करते हुए साधक को अंतःकरण के विकारों से मुक्त होकर सच्चे आनंद की प्राप्ति का मार्ग दिखाया गया है।

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।