महामृत्युंजय मंत्र

ऋग्वेद (ऋषि मार्कण्डेय)
महादेव मंत्र मंत्र शिव
॥ दोहा ॥

ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्।
उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय माऽमृतात्॥

॥ चौपाई ॥

ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्।
उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय माऽमृतात्॥

सरल भावार्थ:
हम त्रि-नेत्रधारी, सुगन्धित और सबका पोषण करने वाले भगवान शिव की आराधना करते हैं। जिस प्रकार पका हुआ खरबूजा बेल के बंधन से सहज ही मुक्त हो जाता है, उसी प्रकार हम भी संसार और मृत्यु के भय से मुक्त होकर अमरत्व (मोक्ष) को प्राप्त करें।

जप विधि एवं फल:
यह मंत्र अकाल मृत्यु, असाध्य रोग, भय और नकारात्मक ऊर्जा को नष्ट कर दीर्घायु, आत्मबल और शांति प्रदान करता है।

॥ दोहा ॥

ॐ नमः शिवाय॥

सरल हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक महत्व

ऋषि मार्कण्डेय द्वारा रचित यह मंत्र भगवान शिव का सर्वाधिक शक्तिशाली संजीवनी मंत्र है जो रोग, भय और अकाल मृत्यु को हरता है।

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।