डमडम डमरूवाले - भस्म विभूषित रूप कीर्तन

संत तुकाराम
महादेव भजन भजन महादेव शिव
॥ दोहा ॥

कस्तूरी कुंडलि बसै, मृग ढूँढै बन माहि।
ऐसे घट घट राम हैं, दुनिया देखै नाहि॥

॥ चौपाई ॥

ॐ नमः शिवाय मंत्र पावन, जपते कटे अज्ञान।
महाकाल के पावन द्वारे, पावत सब कल्यान॥
अगम अगोचर रूप तुम्हारा, कोई न पावे पार।
साधु संत सब ध्यावत निसिदिन, जय जयकार पुकार॥

मन भज ले तू पावन नाम, यही है सच्चा विश्राम।
संसार के सब रिश्ते झूठे, एक सहारा राम॥

भस्म अंग पर शोभित सोहे, नंदी की असवारी।
पार्वती संग राजत गिर पर, त्रिपुरारी सुखकारी॥
विष प्याला पी जग को तारा, नीलकंठ कहलाए।
दीन दुखियन पर दया करत नित, शिव शंकर मन भाये॥

॥ दोहा ॥

तुका म्हणे विट्ठल नाम, तारी सकल भुवन।
प्रेम भावे कीर्तन करितां, पावे समाधान॥

सरल हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक महत्व

वारकरी संप्रदाय के संत तुकाराम जी का यह अभंग विट्ठल नाम के संकीर्तन से अंतःकरण की शुद्धि और परम शांति का मार्ग दर्शाता है। इस पावन भजन में महादेव शिव के आशुतोष स्वरूप की स्तुति करते हुए साधक को अंतःकरण के विकारों से मुक्त होकर सच्चे आनंद की प्राप्ति का मार्ग दिखाया गया है।

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।