ऐसी बानी बोलिए, मन का आपा खोय।
औरन को सीतल करै, आपहु सीतल hoy॥
हाथ धनुष सर तरकस सोहे, राजीव लोचन राम।
दीन अनाथ सखा रघुवर जी, कोटि मदन छवि धाम॥
शबरी के बेर प्रेम से खाये, निषाद राज उर लाये।
समता और प्रेम की मूरत, सब संकट हर धाये॥
नाम जपे से पाप नशावे, जन्म मरण के फेर मिटावे।
संतन के संग मन रंग लीजै, जीवन सफल बनावे॥
अवधपुरी में आनंद छायो, प्रगटे रघुकुल भानु।
सकल लोक जयकार मनावे, प्रमुदित सब नर जानु॥
कौशल्या सुत जन सुखकारी, नयन विशाल अनूप।
चरण सरोज पखारत मुनिवर, निर्मल पावन रूप॥
तुका म्हणे विट्ठल नाम, तारी सकल भुवन।
प्रेम भावे कीर्तन करितां, पावे समाधान॥