श्री सत्यनारायण व्रत कथा (प्रथम व द्वितीय अध्याय संक्षेप)

स्कंद पुराण (रेवा खंड)
विष्णु भगवान कथा कथा सत्यनारायण
॥ दोहा ॥

सत्यनारायण देव की, जो कोई गावे बात।
ऋद्धि सिद्धि घर में बसे, मिटे सकल उत्पात॥

॥ चौपाई ॥

॥ श्री सत्यनारायण कथा - प्रथम अध्याय ॥

एक समय नैमिषारण्य तीर्थ में शौनकादिक अठासी हजार ऋषियों ने परम ज्ञानी सूत जी महाराज से पूछा:
"हे महाभाग! कलिकाल में मनुष्यों के समस्त दुःखों को दूर करने वाला और मनोवांछित फल देने वाला कौन सा ऐसा सुगम व्रत अथवा तप है? कृपा कर हमें बतलाइए।"

सूत जी बोले:
"हे ऋषियों! यही प्रश्न एक बार देवर्षि नारद जी ने जगतपिता भगवान श्री नारायण से क्षीरसागर में पूछा था। तब भगवान श्री हरि ने नारद जी से कहा:
'हे वत्स! मृत्युलोक में एक ऐसा व्रत है जो स्वर्ग और पृथ्वी दोनों पर परम दुर्लभ और तुरंत फल देने वाला है। वह है श्री सत्यनारायण भगवान का व्रत और पूजन। जो मनुष्य भक्ति भाव से इस व्रत को करता है, वह इस लोक में सब सुख भोगकर अंत में मोक्ष को प्राप्त होता है।'

॥ द्वितीय अध्याय (निर्धन ब्राह्मण की कथा) ॥

काशी नगरी में एक अत्यंत दरिद्र, धार्मिक और भिक्षुक ब्राह्मण रहता था। वह प्रतिदिन क्षुधा से व्याकुल होकर भिक्षाटन करता था। ब्राह्मण की दीन दशा देखकर भगवान श्री हरि ने एक वृद्ध ब्राह्मण का रूप धारण किया और उसके पास जाकर पूछा: 'हे विप्र! तुम इतने दुःखी होकर क्यों भटकते हो?'

ब्राह्मण ने अपनी दरिद्रता बताई। तब वृद्ध ब्राह्मण रूपी भगवान ने कहा: 'हे ब्राह्मण! भगवान सत्यनारायण सर्व-मनोरथ पूर्ण करने वाले हैं। तुम उनका विधिपूर्वक पूजन करो।'

ब्राह्मण ने घर आकर संकल्प लिया कि आज भिक्षा में जो कुछ मिलेगा, उसी से सत्यनारायण भगवान का पूजन करूँगा। उस दिन उसे प्रचुर भिक्षा मिली। उसने केला, घी, दूध, गेहूँ का आटा और शर्करा मिलाकर 'सपाद' (सवाया) प्रसाद बनाया और बंधु-बांधवों सहित श्रद्धा से पूजन किया। भगवान सत्यनारायण की कृपा से वह समस्त दुःखों और दरिद्रता से मुक्त होकर धन-धान्य से संपन्न हो गया।

॥ दोहा ॥

सत्यनारायण भगवान की जय। बोलो लक्ष्मी नारायण भगवान की जय॥

सरल हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक महत्व

स्कंद पुराण के रेवा खंड में वर्णित श्री सत्यनारायण व्रत कथा सत्य, श्रद्धा, कृतज्ञता और बंधु-बांधवों के साथ ईश-वंदन की पावन प्रेरणा देती है।

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।