शिव शंकर करुणा निधान, औढर दानी देव।
अंजाने में भी जो भजे, सो पावे पद छेव॥
॥ शिव पुराणोक्त महाशिवरात्रि कथा ॥
प्राचीन काल में एक गुरुद्रुह नाम का शिकारी (व्याध) था। वह वन में पशुओं का आखेट करके अपने परिवार का पेट पालता था। एक बार महाशिवरात्रि के दिन वह आखेट की खोज में वन में भटकता रहा, परंतु संध्या तक उसे कोई शिकार न मिला। भूख-प्यास से व्याकुल होकर वह एक सरोवर के तट पर स्थित बेलपत्र (बिल्व) के वृक्ष पर चढ़कर बैठ गया।
उस वृक्ष के नीचे पत्तों से ढंका हुआ एक प्राचीन शिवलिंग स्थापित था, जिससे शिकारी अनभिज्ञ था।
प्रथम प्रहर:
रात्रि के प्रथम प्रहर में एक गर्भिणी हिरणी जल पीने सरोवर पर आई। शिकारी ने धनुष पर बाण चढ़ाया। बाण खींचते समय बेलपत्र के कुछ पत्ते टूटकर नीचे शिवलिंग पर गिर पड़े। हिरणी ने भयभीत होकर कहा: 'हे व्याध! मैं गर्भिणी हूँ, अपने बच्चों को जन्म देकर सुरक्षित कर आऊँ, तब तुम मेरा वध कर लेना।' शिकारी ने उसकी सत्यनिष्ठा देखकर उसे जाने दिया। शिवलिंग पर अनजाने में ही प्रथम प्रहर का बिल्वपत्र अर्पण हो गया।
द्वितीय व तृतीय प्रहर:
दूसरे प्रहर में उसकी बहन और तीसरे प्रहर में नर मृग (हिरण) आया। शिकारी ने हर बार बाण ताना और हर बार बेलपत्र शिवलिंग पर गिरे। शिकारी ने उन सभी की सत्यनिष्ठा और परिवार-प्रेम देखकर उन्हें भी समय दिया।
चतुर्थ प्रहर (उद्धार):
प्रातःकाल संपूर्ण मृग परिवार स्वेच्छा से शिकारी के समक्ष उपस्थित हो गया। व्याध का कठोर हृदय रात भर के उपवास, जागरण और अनजाने में हुए शिवलिंग पूजन के प्रभाव से पूर्णतः शुद्ध और पिघल चुका था। उसने धनुष बाण फेंक दिए और हाथ जोड़ लिए।
तत्काल भगवान शिव अपने दिव्य रूप में प्रकट हुए और व्याध तथा उस मृग परिवार दोनों को दिव्य विमान से शिवलोक भेजकर मोक्ष प्रदान किया।
हर हर महादेव! भगवान भोलेनाथ की करुणा का कोई ओर-छोर नहीं है।