राघवेंद्र सरकार - सदा सहाई रूप विनय पद

संत सूरदास
श्री राम भजन भजन श्री राम
॥ दोहा ॥

दुःख में सुमिरन सब करे, सुख में करै न कोय।
जो सुख में सुमिरन करे, दुःख काहे को hoy॥

॥ चौपाई ॥

अवधपुरी में आनंद छायो, प्रगटे रघुकुल भानु।
सकल लोक जयकार मनावे, प्रमुदित सब नर जानु॥
कौशल्या सुत जन सुखकारी, नयन विशाल अनूप।
चरण सरोज पखारत मुनिवर, निर्मल पावन रूप॥

प्रभु जी तुम चंदन हम पानी, जाकी अंग अंग बास समानी।
तुम घन बन हम मोरा, जैसे चितवत चंद चकोरा॥

राम नाम की अमृत धारा, पावन करत जहान।
जाके सुमिरन ते सब सिध होई, गावत वेद पुरान॥
प्रभु चरनन की दासी विनवे, राखो अपनी छाँव।
भवसागर तर जावे प्राणी, लेत राम को नाँव॥

॥ दोहा ॥

सूरदास प्रभु तुम्हरे दरश बिन, नैनन चैन न पावे।
श्यामल सुंदर बाल रूप लखि, कोटि मदन शरमावे॥

सरल हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक महत्व

महाकवि सूरदास जी का यह पद ब्रज रस और वात्सल्य भाव से परिपूर्ण है, जिसमें प्रभु के दिव्य रूप का साक्षात्कार कराया गया है। इस पावन भजन में श्री राम के शरणागत वत्सल स्वरूप की स्तुति करते हुए साधक को अंतःकरण के विकारों से मुक्त होकर सच्चे आनंद की प्राप्ति का मार्ग दिखाया गया है।

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।