न्यायाधीश शनि महाराज - सत्य न्याय की राह कीर्तन

अब्दुर्रहीम ख़ानख़ाना
शनि देव भजन भजन शनि देव
॥ दोहा ॥

माला फेरत जुग भया, फिरा न मन का फेर।
कर का मनका डारि दे, मन का मनका फेर॥

॥ चौपाई ॥

नीलांजन समाभासं रविपुत्रं यमाग्रजम्।
छायामार्तण्ड संभूतं तं नमामि शनैश्चरम्॥
कौवे पर असवार विराजे, नील वसन तन धारे।
कर्म अनुसार फल देत विधाता, संकट दूर निवारे॥

ज्योति स्वरूप अखंड तुम्हारा, जग का पालनहार दुलारा।
अंधकार से मुक्ति दीजो, प्रभु तुम प्राण अधारा॥

शनि देव की कृपा जो पावे, कष्ट कटे सब भारे।
सत्य न्याय की राह चलावे, भक्तन काज संवारे॥
तेल तिल उड़द दीप जलाकर, शीश झुकावत प्राणी।
दया दृष्टि कीजो हे स्वामी, सूर्यपुत्र कल्याणी॥

॥ दोहा ॥

रहिमन विपदा हू भली, जो थोड़े दिन होय।
हित अनहित या जगत में, जानि परत सब कोय॥

सरल हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक महत्व

कविवर रहीम का यह नीति पद जीवन के व्यावहारिक सत्य, धैर्य और ईश्वर पर अटूट विश्वास की सीख देता है। इस पावन भजन में शनि देव के नील वर्ण स्वरूप की स्तुति करते हुए साधक को अंतःकरण के विकारों से मुक्त होकर सच्चे आनंद की प्राप्ति का मार्ग दिखाया गया है।

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।