डमडम डमरूवाले - महाकाल दरबार संकीर्तन

संत रविदास
महादेव भजन भजन महादेव शिव
॥ दोहा ॥

जिन खोजा तिन पाइया, गहरे पानी पैठ।
मैं बपुरा बूडन डरा, रहा किनारे बैठ॥

॥ चौपाई ॥

कैलाश शिखर विराजे भोला, शांत स्वरूप अपार।
भक्त पुकारे दौड़े आवे, देवे मुक्ति द्वार॥
अविनाशी काशी के स्वामी, अंतर्यामी नाथ।
दया दृष्टि अब कीजो शंभू, राखो सर पर हाथ॥

हरि के चरणन में सुख भारी, जहाँ बिराजे करुणा सारी।
भव के सागर तर जावेगा, सुमिरन कर ले बनवारी॥

ॐ नमः शिवाय मंत्र पावन, जपते कटे अज्ञान।
महाकाल के पावन द्वारे, पावत सब कल्यान॥
अगम अगोचर रूप तुम्हारा, कोई न पावे पार।
साधु संत सब ध्यावत निसिदिन, जय जयकार पुकार॥

॥ दोहा ॥

कहे रविदास खलास चमारा, जो परसै हरि चरण।
जाके घट में प्रेम बसे है, ताको प्रभु की शरण॥

सरल हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक महत्व

संत शिरोमणि रविदास जी का यह निर्मल भक्ति पद आडंबर रहित सात्विक हृदय और समरसता की आध्यात्मिक ज्योति प्रज्वलित करता है। इस पावन भजन में महादेव शिव के देवों के देव स्वरूप की स्तुति करते हुए साधक को अंतःकरण के विकारों से मुक्त होकर सच्चे आनंद की प्राप्ति का मार्ग दिखाया गया है।

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।