कैला देवी चालीसा

पारंपरिक
माता दुर्गा चालीसा Chalisa Maa Kaila Chalisa
॥ पावन पाठ ॥

नवदुर्गा, नवरात्रि, नवरात्रे, नवरात्रि, माता की चौकी, देवी जागरण, जगराता, शुक्रवार दुर्गा तथा अष्टमी के शुभ अवसर पर श्री कैला देवी मंदिर करौली में गाये जाने वाला श्री कैला मैया का प्रसिद्ध चालीसा।

॥ दोहा ॥

जय जय कैला मात हे

तुम्हे नमाउ माथ ॥

शरण पडूं में चरण में

जोडूं दोनों हाथ ॥

आप जानी जान हो

मैं माता अंजान ॥

क्षमा भूल मेरी करो

करूँ तेरा गुणगान ॥

॥ चौपाई ॥

जय जय जय कैला महारानी ।

नमो नमो जगदम्ब भवानी ॥

सब जग की हो भाग्य विधाता ।

आदि शक्ति तू सबकी माता ॥

दोनों बहिना सबसे न्यारी ।

महिमा अपरम्पार तुम्हारी ॥

शोभा सदन सकल गुणखानी ।

वैद पुराणन माँही बखानी ॥4॥

जय हो मात करौली वाली ।

शत प्रणाम कालीसिल वाली ॥

ज्वालाजी में ज्योति तुम्हारी ।

हिंगलाज में तू महतारी ॥

तू ही नई सैमरी वाली ।

तू चामुंडा तू कंकाली ॥

नगर कोट में तू ही विराजे ।

विंध्यांचल में तू ही राजै ॥8॥

धौलागढ़ बेलौन तू माता ।

वैष्णवदेवी जग विख्याता ॥

नव दुर्गा तू मात भवानी ।

चामुंडा मंशा कल्याणी ॥

जय जय सूये चोले वाली ।

जय काली कलकत्ते वाली ॥

तू ही लक्ष्मी तू ही ब्रम्हाणी ।

पार्वती तू ही इन्द्राणी ॥12॥

सरस्वती तू विद्या दाता ।

तू ही है संतोषी माता ॥

अन्नपुर्णा तू जग पालक ।

मात पिता तू ही हम बालक ॥

तू राधा तू सावित्री ।

तारा मतंग्डिंग गायत्री ॥

तू ही आदि सुंदरी अम्बा ।

मात चर्चिका हे जगदम्बा ॥16॥

एक हाथ में खप्पर राजै ।

दूजे हाथ त्रिशूल विराजै ॥

कालीसिल पै दानव मारे ।

राजा नल के कारज सारे ॥

शुम्भ निशुम्भ नसावनि हारी ।

महिषासुर को मारनवारी ॥

रक्तबीज रण बीच पछारो ।

शंखासुर तैने संहारो ॥20॥

ऊँचे नीचे पर्वत वारी ।

करती माता सिंह सवारी ॥

ध्वजा तेरी ऊपर फहरावे ।

तीन लोक में यश फैलावे ॥

अष्ट प्रहर माँ नौबत बाजै ।

चाँदी के चौतरा विराजै ॥

लांगुर घटूअन चलै भवन में ।

मात राज तेरौ त्रिभुवन में ॥24॥

घनन घनन घन घंटा बाजत ।

ब्रह्मा विष्णु देव सब ध्यावत ॥

अगनित दीप जले मंदिर में ।

ज्योति जले तेरी घर-घर में ॥

चौसठ जोगिन आंगन नाचत ।

बामन भैरों अस्तुति गावत ॥

देव दनुज गन्धर्व व किन्नर ।

भूत पिशाच नाग नारी नर ॥28॥

सब मिल माता तोय मनावे ।

रात दिन तेरे गुण गावे ॥

जो तेरा बोले जयकारा ।

होय मात उसका निस्तारा ॥

मना मनौती आकर घर सै ।

जात लगा जो तोंकू परसै ॥

ध्वजा नारियल भेंट चढ़ावे ।

गुंगर लौंग सो ज्योति जलावै ॥32॥

हलुआ पूरी भोग लगावै ।

रोली मेहंदी फूल चढ़ावे ॥

जो लांगुरिया गोद खिलावै ।

धन बल विद्या बुद्धि पावै ॥

जो माँ को जागरण करावै ।

चाँदी को सिर छत्र धरावै ॥

जीवन भर सारे सुख पावै ।

यश गौरव दुनिया में छावै ॥36॥

जो भभूत मस्तक पै लगावे ।

भूत-प्रेत न वाय सतावै ॥

जो कैला चालीसा पढ़ता।

नित्य नियम से इसे सुमरता ॥

मन वांछित वह फल को पाता ।

दुःख दारिद्र नष्ट हो जाता ॥

गोविन्द शिशु है शरण तुम्हारी ।

रक्षा कर कैला महतारी ॥40॥

॥ दोहा ॥

संवत तत्व गुण नभ भुज सुन्दर रविवार ।

पौष सुदी दौज शुभ पूर्ण भयो यह कार ॥

॥ इति कैला देवी चालीसा समाप्त ॥

आरती: अम्बे तू है जगदम्बे काली | जय अम्बे गौरी, मैया जय श्यामा गौरी

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।