॥ दोहा ॥
मोको कहाँ ढूँढ़े रे बन्दे, मैं तो तेरे पास में।
ना तीरथ में ना मूरत में, ना एकांत निवास में॥
॥ चौपाई ॥
ना मंदिर में ना मस्जिद में, ना काबे कैलास में।
ना मैं जप में ना मैं तप में, ना मैं बरत उपास में॥
मोको कहाँ ढूँढ़े रे बन्दे...
ना मैं क्रिया कर्म में रहता, ना ही योग संन्यास में।
खोजी होय तो तुरते मिलिहौं, इक पल की तलास में॥
मोको कहाँ ढूँढ़े रे बन्दे...
कहै कबीर सुनो भई साधो, सब स्वाँसों की स्वाँस में।
मोको कहाँ ढूँढ़े रे बन्दे, मैं तो तेरे पास में॥
॥ दोहा ॥
सब घट मेरा सांइयां, सूनी सेज न कोय।
बलिहारी वा घट की, जा घट परगट होय॥