संत कबीर के अमर दोहे (२५ दोहे अर्थ सहित)

संत कबीरदास
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॥ दोहा ॥

गुरु गोविंद दोऊ खड़े, काके लागूं पाँय।
बलिहारी गुरु आपने, गोविंद दियो बताय॥

ऐसी बानी बोलिए, मन का आपा खोय।
औरन को शीतल करै, आपहु शीतल होय॥

॥ चौपाई ॥

१. बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिलिया कोय।
जो दिल खोजा आपना, मुझसे बुरा न कोय॥
अर्थ: जब मैं संसार में बुराई खोजने निकला तो मुझे कोई बुरा नहीं मिला, पर जब मैंने अपने अंतर्मन में झाँका तो पाया कि मुझसे बुरा कोई नहीं है।

२. काल करे सो आज कर, आज करे सो अब।
पल में परलय होएगी, बहुरि करेगा कब॥
अर्थ: समय अनमोल है। कल का काम आज और आज का काम अभी करें, क्योंकि जीवन क्षणभंगुर है।

३. दुःख में सुमिरन सब करे, सुख में करै न कोय।
जो सुख में सुमिरन करे, तो दुःख काहे को होय॥
अर्थ: विपत्ति में हर कोई ईश्वर को याद करता है, पर सुख में भूल जाता है। यदि सुख में भी याद किया जाए तो दुःख कभी आ ही नहीं सकता।

४. पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुआ, पंडित भया न कोय।
ढाई आखर प्रेम का, पढ़े सो पंडित होय॥
अर्थ: बड़े-बड़े पोथे पढ़ने से कोई ज्ञानी नहीं बनता। जिसने प्रेम के ढाई अक्षर का मर्म समझ लिया, वही सच्चा ज्ञानी है।

५. माटी कहे कुम्हार से, तू क्या रूँदे मोहि।
इक दिन ऐसा आएगा, मैं रूँदूंगी तोहि॥
अर्थ: मिट्टी कुम्हार से कहती है कि आज तू मुझे रौंद रहा है, पर एक दिन ऐसा आएगा जब तू मुझमें ही समा जाएगा।

६. बड़ा भया तो क्या भया, जैसे पेड़ खजूर।
पंथी को छाया नहीं, फल लागे अति दूर॥
अर्थ: बड़प्पन वही है जो दूसरों के काम आए, खजूर के पेड़ जैसा नहीं जिसकी न छाया मिलती है और फल भी बहुत दूर लगता है।

७. साईं इतना दीजिए, जा मे कुटुम समाय।
मैं भी भूखा न रहूँ, साधु न भूखा जाय॥
अर्थ: हे प्रभु, मुझे केवल उतना ही दीजिए जितने में परिवार का भरण-पोषण हो सके; मैं भी भूखा न रहूँ और द्वार पर आया साधु भी भूखा न लौटे।

८. जाति न पूछो साधु की, पूछ लीजिए ज्ञान।
मोल करो तरवार का, पड़ा रहन दो म्यान॥
अर्थ: किसी सज्जन या संत की जाति नहीं, उसका ज्ञान देखना चाहिए; तलवार का मोल होता है, म्यान का नहीं।

९. कस्तूरी कुंडल बसै, मृग ढूंढ़े बन माहि।
ऐसे घट-घट राम हैं, दुनिया देखे नाहिं॥
अर्थ: जैसे कस्तूरी हिरण की नाभि में होती है पर वह उसे वन-वन ढूँढ़ता फिरता है, वैसे ही परमात्मा सबके हृदय में विराजमान हैं पर लोग बाहर भटकते हैं।

१०. धीरे-धीरे रे मना, धीरे सब कुछ होय।
माली सींचे सौ घड़ा, ऋतु आए फल होय॥
अर्थ: धैर्य रखें, जीवन में सब कुछ अपने समय पर होता है। माली भले ही पेड़ को सौ घड़े पानी पिला दे, फल ऋतु आने पर ही लगेगा।

॥ दोहा ॥

कबीरा खड़ा बाज़ार में, माँगे सबकी खैर।
ना काहू से दोस्ती, ना काहू से बैर॥

सरल हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक महत्व

संत कबीर के दोहे मनुष्य को आडंबर, जाति-भेद और अहंकार से मुक्त कर सत्य, प्रेम और आत्म-बोध का शाश्वत मार्ग दिखाते हैं।

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।