झीनी झीनी बीनी चदरिया (कबीर पद)

संत कबीरदास
अन्य संत साहित्य संत साहित्य कबीर
॥ दोहा ॥

झीनी झीनी बीनी चदरिया।
काहे कै ताना, काहे कै भरनी, कौन तार से बीनी चदरिया॥

॥ चौपाई ॥

इड़ा पिंगला ताना भरनी, सुखमन तार से बीनी चदरिया।
आठ कंवल दल चरखा डोलै, पांच तत्व गुन तीनी चदरिया॥
झीनी झीनी बीनी चदरिया...

साईं को सियत मास दस लागे, ठोक-ठोक कै बीनी चदरिया।
सो चादर सुर नर मुनि ओढ़ी, ओढ़ि कै मैली कीनी चदरिया॥
झीनी झीनी बीनी चदरिया...

दास कबीर जतन करि ओढ़ी, ज्यों की त्यों धर दीनी चदरिया।
झीनी झीनी बीनी चदरिया...

॥ दोहा ॥

ज्यों की त्यों धर दीनी चदरिया, दास कबीर जतन करि ओढ़ी।
झीनी झीनी बीनी चदरिया॥

सरल हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक महत्व

कबीरदास जी इस पद में मानव शरीर को एक दिव्य चादर की उपमा देते हैं, जिसे परमात्मा ने पाँच तत्वों और तीन गुणों से बुना है, और संत कबीर इसे बिना मैली किए प्रभु को लौटा देते हैं।

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।