जो रस बरस्यो बरसाने सो रस तीन लोक में नाहीं

इंद्रेश जी महाराज
श्री कृष्ण भजन भजन इंद्रेश जी महाराज
॥ दोहा ॥

बरसाने रस सिंधु है, राधा रानी रूप।
इंद्रेश तृषित हिय से पिए, अमृत प्रेम अनूप॥

॥ चौपाई ॥

जो रस बरस्यो बरसाने, सो रस तीन लोक में नाहीं।
धन्य धन्य ये ब्रज की भूमि, धन्य राधिका माहीं॥
जो रस बरस्यो बरसाने॥

बैकुंठ में नहिं सो रस पायो, नहिं कैलास बिराजे।
जो रस राधा जू के द्वारे, निसदिन बाजे गाजे॥
सुर नर मुनि सब तरस रहे हैं, इस पावन रस ताहीं।
जो रस बरस्यो बरसाने, सो रस तीन लोक में नाहीं॥

लाडली जू के चरण कमल की, रज अति सुखदाई।
जाके छूवत ही मन मोहन, सुधबुध सब बिसराई॥
प्रेम सुधा रस बरसे हर पल, निकुंज गलिन के मांहीं।
जो रस बरस्यो बरसाने, सो रस तीन लोक में नाहीं॥

इंद्रेश कहे अहोभाग्य हमारे, बरसाने को पाए।
श्री राधा की कृपा दृष्टि से, सकल मनोरथ धाए॥
जनम जनम की तृषा मिटी अब, शरण तिहारी आहीं।
जो रस बरस्यो बरसाने, सो रस तीन लोक में नाहीं॥

॥ दोहा ॥

बरसाने रस की बूँद जो, पावे कोई सुजान।
इंद्रेश कहे सो जीव ही, पावे पद निर्वान॥

सरल हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक महत्व

बरसाना धाम में बरसने वाले श्री राधा रस की अनुपम महिमा—यह रस वैकुंठ या अन्य किसी लोक में भी सुलभ नहीं है।

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।