रघुपति राघव - करुणा निधान भजन

संत तुलसीदास
श्री राम भजन भजन श्री राम
॥ दोहा ॥

गुरु गोविंद दोऊ खड़े, काके लागूं पांय।
बलिहारी गुरु आपने, गोविंद दियो बताय॥

॥ चौपाई ॥

अवधपुरी में आनंद छायो, प्रगटे रघुकुल भानु।
सकल लोक जयकार मनावे, प्रमुदित सब नर जानु॥
कौशल्या सुत जन सुखकारी, नयन विशाल अनूप।
चरण सरोज पखारत मुनिवर, निर्मल पावन रूप॥

दीन दयाल कृपालु स्वामी, घट घट के तुम अंतर्यामी।
हाथ जोड़ कर शीश नवाऊँ, हरो कलेश त्रिपुरारी॥

राम नाम की अमृत धारा, पावन करत जहान।
जाके सुमिरन ते सब सिध होई, गावत वेद पुरान॥
प्रभु चरनन की दासी विनवे, राखो अपनी छाँव।
भवसागर तर जावे प्राणी, लेत राम को नाँव॥

॥ दोहा ॥

तुलसीदास रघुनाथ शरण में, सदा रहे अनुराग।
जाके हृदय राम बसे हैं, सोई परम बड़भाग॥

सरल हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक महत्व

गोस्वामी तुलसीदास जी विरचित यह विनय पद दैन्य और शरणागति भाव की पराकाष्ठा है, जो मर्यादा पुरुषोत्तम की कृपा का आह्वान करता है। इस पावन भजन में श्री राम के पतित पावन स्वरूप की स्तुति करते हुए साधक को अंतःकरण के विकारों से मुक्त होकर सच्चे आनंद की प्राप्ति का मार्ग दिखाया गया है।

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।