जय जय श्री शनिदेव (शनि देव की आरती)

पारंपरिक स्तुति
शनि देव आरती आरती शनि
॥ दोहा ॥

जय जय श्री शनिदेव भक्तन हितकारी।
सूर्य पुत्र प्रभु छाया महतारी॥ जय जय श्री शनिदेव...

॥ चौपाई ॥

श्याम अंग वक्र दृष्टि चतुर्भुजा धारी।
नीलाम्बर धार नाथ गज की असवारी॥
क्रीट मुकुट शीश राजित दिपत है लिलारी।
मुक्तन की माला गले शोभित बलिहारी॥ जय जय श्री शनिदेव...

मोदक मिष्ठान पान चढ़त हैं सुपारी।
लोहा तिल तेल उड़द महिषी अति प्यारी॥
देव दनुज ऋषि मुनि सब करजोरे भारी।
कष्ट मिटाओ प्रभु हम शरण तिहारी॥ जय जय श्री शनिदेव...

॥ दोहा ॥

शनि देव की आरती जो कोई नर गावे।
रोग शोक सब छूटे सुख संपत्ति पावे॥

सरल हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक महत्व

कर्मफलदाता भगवान शनि देव की आरती कष्टों और बाधाओं से रक्षा कर धर्म पथ पर दृढ़ता देती है।

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।