गुरु गोविंद दोऊ खड़े, काके लागूं पांय।
बलिहारी गुरु आपने, गोविंद दियो बताय॥
शांत आकारं भुजग शयनं पद्मनाभं सुरेशं।
विश्वाधारं गगन सदृशं मेघवर्णं शुभांगम्॥
लक्ष्मीकांतं कमलनयनं योगिभिर्ध्यानगम्यं।
वंदे विष्णुं भवभयहरं सर्वलोकैकनाथम्॥
दीन दयाल कृपालु स्वामी, घट घट के तुम अंतर्यामी।
हाथ जोड़ कर शीश नवाऊँ, हरो कलेश त्रिपुरारी॥
शंख चक्र गदा पद्म विराजे, चार भुजा अति सोहे।
गरुड़ सवार कृपा के सागर, सुर नर मुनि मन मोहे॥
पालनहार सकल जग के तुम, संकट काटनहारे।
शरणागत की रक्षा कीजे, हे प्रभु श्रीपत प्यारे॥
कहे रविदास खलास चमारा, जो परसै हरि चरण।
जाके घट में प्रेम बसे है, ताको प्रभु की शरण॥