॥ दोहा ॥
अमृत है हरि नाम जगत में, इसे छोड़ विष पीना क्या।
हरि नाम नहीं तो जीना क्या, हरि नाम नहीं तो जीना क्या॥
॥ चौपाई ॥
अमृत है हरि नाम जगत में, इसे छोड़ विष पीना क्या।
हरि नाम नहीं तो जीना क्या, हरि नाम नहीं तो जीना क्या॥
काल सदा अपने सिर डोले, ना जाने कब क्या कर डाले।
हरि का नाम जपो रे भाई, जीवन का कोई मोल न जाने॥
अमृत है हरि नाम...
तीरथ नहाय के क्या फल पाया, जो मन का मैल न धोया।
ऊपर ऊपर धोती धोई, भीतर विष का कुआं संजोया॥
अमृत है हरि नाम...
जो प्रभु का सिमरन करते हैं, वो भवसागर तर जाते हैं।
अंत समय जब यमदूत आवैं, हरि भक्त नहीं घबराते हैं॥
अमृत है हरि नाम...
॥ दोहा ॥
हरि ॐ तत्सत्, हरि ॐ तत्सत्।
हरि नाम ही सार है, बाकी सब संसार है॥