अमृत है हरि नाम जगत में (हरि नाम नहीं तो जीना क्या)

पारंपरिक संत वाणी
विष्णु भगवान भजन भजन हरि
॥ दोहा ॥

अमृत है हरि नाम जगत में, इसे छोड़ विष पीना क्या।
हरि नाम नहीं तो जीना क्या, हरि नाम नहीं तो जीना क्या॥

॥ चौपाई ॥

अमृत है हरि नाम जगत में, इसे छोड़ विष पीना क्या।
हरि नाम नहीं तो जीना क्या, हरि नाम नहीं तो जीना क्या॥

काल सदा अपने सिर डोले, ना जाने कब क्या कर डाले।
हरि का नाम जपो रे भाई, जीवन का कोई मोल न जाने॥
अमृत है हरि नाम...

तीरथ नहाय के क्या फल पाया, जो मन का मैल न धोया।
ऊपर ऊपर धोती धोई, भीतर विष का कुआं संजोया॥
अमृत है हरि नाम...

जो प्रभु का सिमरन करते हैं, वो भवसागर तर जाते हैं।
अंत समय जब यमदूत आवैं, हरि भक्त नहीं घबराते हैं॥
अमृत है हरि नाम...

॥ दोहा ॥

हरि ॐ तत्सत्, हरि ॐ तत्सत्।
हरि नाम ही सार है, बाकी सब संसार है॥

सरल हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक महत्व

सांसारिक प्रपंचों और बाह्य दिखावे से परे केवल भगवान के नाम-स्मरण को ही जीवन का वास्तविक सार और मुक्तिदाता बताने वाला भजन।

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।