हनुमानजी कैसे तोड़ा तीनों का घमंड?

पारंपरिक
श्री कृष्ण कथा Prerak-kahani Shri Krishna Prerak-kahani
॥ पावन पाठ ॥

देवी सत्यभामा का रूप, गरुड़देव की गति और सुदर्शन चक्र की शक्ति

हनुमानजी कैसे तोड़ा तीनों के घमंड?

जानिए इस अद्भुत कथा..

एक बार द्वारका में भगवान श्रीकृष्ण अपनी पटरानी सत्यभामा के साथ सिंहासन पर विराजमान थे। निकट ही गरुड़ और सुदर्शन चक्र भी बैठे थे। तीनों के चेहरों पर अपने-अपने गुणों का दिव्य तेज झलक रहा था।

बातों ही बातों में रानी सत्यभामा ने पूछा- हे प्रभु! त्रेता युग में जब आपने राम अवतार लिया था, तब सीता आपकी पत्नी थीं। क्या वे रूप में मुझसे भी ज्यादा सुंदर थीं?

तभी गरुड़ जी बोल उठे- भगवान! क्या इस संसार में मुझसे भी अधिक तेज गति से कोई उड़ सकता है?

सुदर्शन चक्र से भी नहीं रहा गया, वे बोले- प्रभु! मैंने बड़े-बड़े युद्धों में आपको विजय दिलाई है। क्या इस ब्रह्मांड में मुझसे भी शक्तिशाली कोई और अस्त्र है?

द्वारकाधीश मुस्कुराए! वे समझ गए कि उनके इन तीनों परम भक्तों को अपने-अपने गुणों का अहंकार हो गया है। भगवान ने उनके अहंकार को नष्ट करने की एक अद्भुत लीला रची।

उन्होंने गरुड़ को आज्ञा दी- हे गरुड़! तुम शीघ्र हनुमान के पास जाओ और कहना कि भगवान राम, माता सीता के साथ उनकी प्रतीक्षा कर रहे हैं।

गरुड़ तुरंत उड़ चले।

इधर श्रीकृष्ण ने सत्यभामा से कहा कि वे सीता का रूप धारण करें और स्वयं श्रीराम बन गए।

फिर सुदर्शन चक्र को आदेश दिया- तुम महल के द्वार पर पहरा दो और ध्यान रहे, मेरी आज्ञा के बिना कोई अंदर न आ सके।

गरुड़ ने हनुमान जी के पास पहुंचकर उन्हें द्वारका चलने को कहा और अपनी पीठ पर बैठने का प्रस्ताव दिया। हनुमान जी ने विनयपूर्वक कहा- आप चलिए, मैं आता हूँ।

गरुड़ जी ने सोचा कि यह बूढ़ा वानर मेरे बाद ही पहुंचेगा, और वे तेजी से द्वारका की ओर उड़ चले।

लेकिन महल पहुंचकर गरुड़ दंग रह गए! हनुमान जी उनसे पहले ही प्रभु के सामने विराजमान थे। गरुड़ का गति का अहंकार चूर हो गया और सिर लज्जा से झुक गया।

तभी श्रीराम ने पूछा- पवनपुत्र! तुम बिना आज्ञा महल में कैसे आ गए? क्या द्वार पर किसी ने रोका नहीं?

हनुमान जी ने हाथ जोड़कर अपने मुख से सुदर्शन चक्र निकाला और प्रभु के सामने रख दिया। वे बोले- प्रभु! इस चक्र ने मुझे रोका था, इसलिए इसे मुंह में दबाकर मैं आपसे मिलने आ गया। क्षमा करें।

सुदर्शन चक्र की शक्ति का गर्व भी टूट गया! भगवान मंद-मंद मुस्कुराने लगे।

अंत में हनुमान जी ने हाथ जोड़कर श्रीराम से पूछा- हे प्रभु! आज आपने माता सीता के स्थान पर किस दासी को इतना सम्मान दे दिया कि वह आपके साथ सिंहासन पर बैठी है?

यह सुनते ही रानी सत्यभामा के रूप का सारा अहंकार पल भर में चकनाचूर हो गया।

तीनों भक्त (सत्यभामा, गरुड़ और सुदर्शन) भगवान की लीला समझ चुके थे। उनके गर्व के आंसू पश्चाताप में बदल गए और वे प्रभु के चरणों में गिर पड़े।

कथा से सीख:

भगवान अपने भक्तों से असीम प्रेम करते हैं, इसलिए वे कभी उनके भीतर अहंकार को पनपने नहीं देते। जब भी घमंड आये, तो समझ लेना चाहिए कि उसे तोड़ने का समय भी आ गया है!

जय श्रीकृष्ण! जय श्री राम! जय हनुमान!

सरल हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक महत्व

संतो की वाणी आप सभी को एक अद्भुत कथा बता रहा है, देवी सत्यभामा का रूप, गरुड़देव की गति और सुदर्शन चक्र की शक्ति | एक बार भगवान श्रीकृष्ण अपनी पटरानी सत्यभामा के साथ सिंहासन पर विराजमान थे। निकट...

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।