गगन मै थालु रचि चंदु दीपकु बने, तारिका मंडल जनक मोती॥
धूपु मलआनलो पवणु चवरो करे, सगल बनराइ फूलंत जोती॥१॥
कैसी आरती होइ भव खंडना तेरी आरती॥
अनहता सबद बाजंत भेरी॥१॥ रहाउ॥
सहस तव नैन नन नैन हहि तोहि कउ, सहस मूरति नना एक तोही॥
सहस पद बिमल नन एक पद गंध बिनु, सहस तव गंध इव चलत मोही॥२॥
सभ महि जोति जोति है सोइ॥
तिस दै चानणि सभ महि चानणु होइ॥
गुर साखी जोति परगटु होइ॥
जो तिसु भावै सु आरती होइ॥३॥
हरि चरण कमल मकरंद लोभित मनो, अनदिनो मोहे आही पिआसा॥
कृपा जलु देहि नानक सारिंग कउ, होइ जा ते तेरै नाइ वासा॥४॥
एक ओंकार सतिनाम करता पुरखु निरभउ निरवैरु अकाल मूरति अजूनी सैभं गुरप्रसादि॥