गगन मै थालु (गुरु नानक देव जी की वैश्विक आरती)

गुरु नानक देव जी
अन्य गुरु वाणी गुरु वाणी गुरु नानक
॥ दोहा ॥

गगन मै थालु रचि चंदु दीपकु बने, तारिका मंडल जनक मोती॥
धूपु मलआनलो पवणु चवरो करे, सगल बनराइ फूलंत जोती॥१॥

॥ चौपाई ॥

कैसी आरती होइ भव खंडना तेरी आरती॥
अनहता सबद बाजंत भेरी॥१॥ रहाउ॥

सहस तव नैन नन नैन हहि तोहि कउ, सहस मूरति नना एक तोही॥
सहस पद बिमल नन एक पद गंध बिनु, सहस तव गंध इव चलत मोही॥२॥

सभ महि जोति जोति है सोइ॥
तिस दै चानणि सभ महि चानणु होइ॥
गुर साखी जोति परगटु होइ॥
जो तिसु भावै सु आरती होइ॥३॥

हरि चरण कमल मकरंद लोभित मनो, अनदिनो मोहे आही पिआसा॥
कृपा जलु देहि नानक सारिंग कउ, होइ जा ते तेरै नाइ वासा॥४॥

॥ दोहा ॥

एक ओंकार सतिनाम करता पुरखु निरभउ निरवैरु अकाल मूरति अजूनी सैभं गुरप्रसादि॥

सरल हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक महत्व

जगन्नाथ पुरी में गुरु नानक देव जी द्वारा उच्चरित यह अमर आरती संपूर्ण ब्रह्मांड को परमात्मा की आरती करता हुआ देखती है: आकाश थाल है, सूर्य-चंद्र दीपक हैं, तारे मोती हैं और पवन चंवर डुला रही है।

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।